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क्या 22 की लड़ाई में 20 साबित होंगे अखिलेश !!

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अभिषेक मिश्रा और संतोष पांडेय जैसे ब्राह्मण नेताओं का समर्थन प्राप्त करके परशुराम जयन्ती और परशुराम मूर्ति लगाने के अभियान की पहल को इसके तौर पर देखा जा सकता है।

आशीत कुणाल(वरिष्ठ पत्रकार)

2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव दरअसल इस लिहाज़ से बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं कि यह देश की सियासत में मोदी युग की रूपरेखा तय कर देंगे।2024 के आम चुनाव की तस्वीर भी यह चुनाव साफ़ कर देगा. कहा जाता है कि दिल्ली के तख्त का रास्ता उत्तरप्रदेश से हो कर हीं जाता है.यहीं कारण है कि यूपी 2022 का चुनाव जितना भारतीय जनता पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है,उसमें ज़्यादा विपक्ष के लिए के लिए अहमियत रखता है।
कुछ दिनों पहले तक तो ऐसा लग रहा था कि यूपी 2022 में भाजपा की जीत महज़ औपचारिकता रहेगी.. केंद्र में मोदी और प्रदेश में योगी जैसा दमदार चेहरा भाजपा के पास मौजूद है.. वही विपक्ष बिखरा बिखरा सा दिख रहा था. विपक्ष की यूपी में तीन धुरी थी-सपा, बसपा और कांग्रेस. पर अब चुनाव से ऐन पहले जो तस्वीर बन रही है वह विपक्ष के लिए राहत देने वाली बात हो सकती है… ग़ैर भाजपा मतों का ध्रुवीकरण अब प्रदेश में साफ़ दिख रहा है और समाजवादी पार्टी प्रदेश में भाजपा के विकल्प के तौर पर सीधे सीधे उभर रही है. इसका सबसे बड़ा कारण है कि तमाम प्रयास के बावजूद भी प्रियंका गांधी अब तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का संगठन खड़ा नहीं कर सकी है .यहां कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं देखा जा रहा है, तो दूसरी तरफ मायावती पर भाजपा के प्रति नरम रवैया रखने का आरोप लग रहा है. बसपा – भाजपा के अंदरूनी साठगांठ की ख़बरें भी ख़ूब चर्चा में रह रही है । इन परिस्थितियों का लाभ अखिलेश यादव बख़ूबी उठा रहे हैं और यही कारण है कि 2022 में समाजवादी पार्टी और भाजपा के बीच सीधी टक्कर की तस्वीर बनती दिख रही है। मेरी हाल की कलकत्ता और मुंबई की यात्रा के दौरान निजी मुलाक़ातों में चाहे एनसीपी के नेता हों या तृणमूल कांग्रेस के,वे लगातार इस बात को लेकर सवाल पूछते रहते हैं कि अखिलेश यादव यूपी में वापसी कर पाएंगे या नहीं ? यह सवाल ही दर्शाने को काफ़ी है कि पूरे देश के विपक्षी दलों की काफ़ी उम्मीदे यूपी में अखिलेश यादव पर टिकी हैं। विपक्षी दलों को यह उम्मीद हो रहा है कि बंगाल में ममता बनर्जी की तरह यूपी में भी अखिलेश यादव शायद भाजपा के विजय रथ को रोक देंगें । समाजवादी पार्टी के लिए अच्छी बात यह है कि बसपा और कांग्रेस के कमज़ोर होने के कारण भाजपा मतों का ध्रुवीकरण बहुत तेज़ी से समाजवादी पार्टी के पक्ष में हो रहा है . बंगाल चुनाव में जिस तरह मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण टीएमसी के पक्ष में हुआ है उससे समाजवादी पार्टी की उम्मीदें बढ़ गईं हैं. इस बात की पूरी संभावना है कि बंगाल की तरह ही उत्तर प्रदेश में भी मुस्लिम वोटर बसपा या किसी मुस्लिम पार्टी को तरजीह न देकर समाजवादी पार्टी के साइकिल को मजबूत करेंगें । यादव समाजवादी पार्टी का परंपरागत वोट रहा है.लोकसभा चुनाव में मोदी के करिश्मे का कारण इसमें कुछ सेंध लगी थी लेकिन अखिलेश यादव के रूप में विधानसभा में विपक्ष के बड़े चेहरे के सामने होने पर यादव का एक मुश्त वोट समाजवादी पार्टी के पास ही रहेगा।
इसके अलावा हाल के दिनों में अखिलेश यादव ने नया सोशल इंजीनियरिंग भी प्रदेश में किया है जिसमें ख़ासतौर पर भाजपा से नाराज़ चल रहे ब्राह्मणों को लुभाने के लिए कई प्रयास किए गए हैं।अभिषेक मिश्रा और संतोष पांडेय जैसे ब्राह्मण नेताओं का समर्थन प्राप्त करके परशुराम जयन्ती और परशुराम मूर्ति लगाने के अभियान की पहल को इसके तौर पर देखा जा सकता है।अखिलेश नए सोश्यल इंजीनियरिंग के तहत अगर आगामी विधानसभा चुनाव में बड़ी संख्या में ब्राह्मणों को टिकट दें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।
वही बात अगर अखिलेश यादव के नेतृत्व क्षमता की करें तो अखिलेश अब अपने पिता मुलायम सिंह के वारिस की छवि से निकल कर आज एक परिपक्व और आत्मविश्वास से लबरेज़ स्वतंत्र राजनेता बन चुके हैं.वे अपनी चुनावी रणनीति अब खुद बनाते हैं और फ़ैसले अपने हिसाब से लेते हैं.अखिलेश अन्य नेता पुत्रों की तरह अपनी कोई कोटरी यहाँ सिंडिकेट के भरोसे नहीं रहते .. वे जिले के, ब्लॉक स्तर के कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद करते है.पंचायत चुनाव में उनके सीधे दख़ल के कारण ही समाजवादी पार्टी इतना शानदार प्रदर्शन कर पायी। एक राष्ट्रीय चेहरा होकर भी ज़मीनी कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद करने में अखिलेश गुरेज़ नहीं करते. मुलायम सिंह यादव की तरह ही अखिलेश यादव अब हर ज़िले और हर विधानसभा में कार्यकर्ताओं को न केवल नाम से जानते है वरन उन्हें हर विधानसभा के राजनीतिक स्थिति का और नेताओं के सक्रिय और निष्क्रिय रहने का पता भी रहता है.अखिलेश की सक्रियता के कारण समाजवादी पार्टी के नेताओं को पहले से ज़्यादा सतर्क रहना पड़ रहा है, उन्हें पता है अखिलेश यादव के फीडबैक का सिस्टम मजबूत है .अखिलेश यादव लखनऊ में बैठे नेताओं के फीडबैक पर भरोसा न कर खुद सोशल मीडिया और बाक़ी माध्यमों से अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं, संभावित उम्मीदवारों के कार्यशैली पर नज़र रखते हैं.
प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की अपनी समस्याएँ हैं,जिनसे वह जूझ रही है. दिल्ली और लखनऊ के बीच राजनीतिक खींचतान पर्दे के बाहर आ चुका है तो सरकार और संगठन के बीच लंबे समय तक संवादहीनता की स्थिति बनी रही है.ऐसे में चुनाव से ठीक पहले उत्तर प्रदेश में भाजपा डैमेज कंट्रोल में लगी है और लखनऊ- दिल्ली के बीच दूरियां पाटने की लगातार कोशिश की जा रही है.सरकार और संगठन के बीच तालमेंल बिठाने की कोशिश संघ कर रहा है. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा को अपना घर दुरुस्त करने में कहीं देर तो नहीं हो गया है।
भाजपा अगर विकास के मुद्दे पर भी चुनाव लड़ती है तो अखिलेश यादव के क़रीबी लोगों का कहना है कि अखिलेश का पिछला कार्यकाल योगी सरकार के विकास के एजेंडे पर भारी पड़ेगा। अखिलेश यादव को आज भी इस बात का मलाल है कि उनके विकास कार्यों की स्वीकृति होने के बावजूद भी मोदी लहर के कारण 2017 में उनकी कुर्सी चली गई थी। इस बार स्थिति बदली हुई है,कोरोना की दूसरी लहर में लोगों की बढ़ी परेशानियों सेजनता में काफ़ी नाराज़गी भी है.
किसान आंदोलन भी भाजपा के गले की फांस बन गया है.यह आंदोलन पश्चिम यूपी में भारतीय जनता पार्टी के पूरे समीकरण को बिगाड़ने की क्षमता रखता है ।
पंचायत चुनाव में जाटों के बड़े तबके ने भाजपा का विरोध किया है.इसके रिजल्ट से उत्साहित अखिलेश स्वर्गीय चौधरी अजीत सिंह के बेटे जयंत चौधरी के साथ गठबंधन कर समाजवादी पार्टी की स्थिति जाट बाहुल पश्चिमी उत्तरप्रदेश में भी मजबूत कर सकते हैं है। चुनाव से ऐन पहले अलग अलग पार्टियों से बड़ी संख्या में नेताओं का समाजवादी पार्टी शामिल होना इस बात को दर्शाता है कि ज़मीनी स्तर पर चुनाव लड़ने वालों का रुझान समाजवादी पार्टी की ओर है.
चुनाव से आठ महीने पहले अखिलेश यादव ने वापसी के लिए एक मज़बूत ज़मीन तो तैयार कर ली है फिर भी उन्हें अभी और फ़ासला तय करना है .भारतीय जनता पार्टी के चुनावी मशीनरी और प्रोपगेंडा से उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में मुक़ाबला अखिलेश यादव के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा। ऐसे में आज लाख टके का सवाल तो यही है कि 22 में यूपी में 20 साबित कौन होगा … भाजपा या अखिलेश ?