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अभी के दौर में ज़िन्दगी को बेहतर करने के लिये संगीत ,साहित्य और मनोरंजन ज़रूरी है : ‘थॉट्स न इंक’

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सुनयना सिंह

एक ओर जहां देश ,समाज,परिवार में एक मिश्रित सा माहौल है,भय , उत्सुकता,आशंका से युक्त,वहीं कला ,साहित्य प्रेमी अपने अपने तौर से भविष्य के सपने बुनते हुए दिख रहे हैं।कुछ ऐसा ही नज़ारा थॉट्स न इंक ने दर्शाया दिनांक कल ,संध्या 4 से 6 बजे तक बिहार प्रदेश के एक से एक युवा रचनाकार एवं मूर्धन्य साहित्यकारों सहित ऑनलाइन पोएट्री मीट का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता जाने माने कवि एवं थॉट्स न इंक संस्था के सह संस्थापक श्री ज्ञानेंद्र भारद्वाज ने की । फेसबुक लाइव के माध्यम से आयोजित इस पोएट्री मीट का संचालन मशहूर गायक एवं मंच संचालक श्री अनुराग कीर्ति जी ने किया। इस अवसर पर कवि डॉ सत्येन्द्र सत्यार्थी, डॉ अजय कुमार एवं मो नसीम अख्तर ने भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया एवं अपनी रचनाओं से समा बाँधा । बिहार प्रदेश की एक मशहूर लोकगायिका श्रीमती मनीषा श्रीवास्तव ने पारम्परिक लोक गीत गाकर महफ़िल की रौनक बढ़ा दी। कवि राजीव रंजन , सूरज बिहारी ठाकुर, अनुराग कश्यप ठाकुर कवियत्री नेहा नुपुर ,निशु प्रिया, अचला श्रीवास्तव, सुजाता झा, खुशबु कुमारी, रश्मि प्रसाद गुप्ता, शिप्रा महेश्वरी, दीप्ति श्रीवास्तव, सिमरन राज, सोनम बर्नवाल, और रेणुका प्रियदर्शी ने भी अपनी रचना सुनाके सबको मोहित कर दिया ।
विदित है कि थॉट्स न इंक संस्था एक गैर सरकारी संगठन है जो साहित्य के माध्यम से नवांकुरों और साहित्य प्रेमियों को प्रोत्साहित करने का कार्य करती है |

लाकारो और उनकी खूबसुरत रचनाये :

1. सूरज बिहारी ठाकुर –
दर्द इक इम्तहान है और मैं
इम्तिहानों से अब नहीं डरता
2. सिमरन राज –
बस अब और नहीं खेला जा रहा है इन तज़ुर्बों से
मेरे लिए फिर से ‘एक गुड़िया’ खरीद दो न माँ!
3. सुजाता झा –
आप सब जो दिखते हैं वह हैं नहीं, जो है वह दिखते नहीं।
इस दिखावटी दुनिया से तंग, हो जाती हूं रोज दंग।
4. दीप्ति श्रीवास्तव –
तेरी मेरी प्रेम कहानी
हम जैसी है दीवानी…!!
5. श्रीमती रश्मि प्रसाद गुप्ता –
चाँद की चांदनी में नहाया हुआ है, जब भी इधर वो आया हुआ है
पड़ी जिस तरफ भी रश्मियां उसकी, हमने भी वही दिल जलाया हुआ है।
6. सोनम बर्नवाल –
मैं जिसको घर बनाती गई,
वो किराए का मकान था।
7. रेणुका प्रियदर्शी –
मैं जुदाई के दिन गिनती रह गयी
पर दिल तो गणित जानता ही नहीं
8. खुशबु कुमारी –
ग़ज़ल तो खामोश धड़कने ही, उम्दा कर पाती हैं,
वरना गुफ्तगू तो ,पत्थर की दीवारें भी कर लेतीं है।
9. मो नसीम अख्तर –
इधर शम्मे उलफत जलाई गई है
उधर कोई आँधी उठाई गई