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शराबबंदी एक सामाजिक, अध्यात्मिक आंदोलन-गुप्तेश्वर पांडेय

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मुझे राजनीति नहीं करनी, चुनाव नहीं लड़ना बिल्कुल अफवाह है-गुप्तेश्वर पांडेय

बिहार पुलिस अकादमी एवं बिहार सैन्य पुलिस के डीजीपी, 1987 बैच के आइपीएस अधिकारी गुप्तेश्वर पांडेय का जन्म बक्सर जिले के छोटे से गांव गेरुआ में 1961 में हुआ था। बिजली, सड़क, अस्पताल और स्कूल जैसी मूलभूत सुविधाओं से कटे इस गांव के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के लिए नदी-नाला पार कर दूर के गांव जाना होता था। दूसरे गांव के स्कूल में भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव था। पढ़ाई का माध्यम भी ठेठ भोजपुरी।ऐसे माहौल में गुप्तेश्वर की जीवन यात्रा की शुरुआत हुई। गुप्तेश्वर  पांडेय के दिल में कुछ बड़ा करने का जज्बा था और यही कारण रहा कि तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद बिहार पुलिस के शीर्ष पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। गुप्तेश्वर पांडेय से विभिन्न पहलुओं पर बात की सर्वेश कुमार मिश्र ने। पेश हैं प्रमुख अंश..

सवाल- यूपीएससी में आने की योजना के बारे में बतायें?

जवाब- विद्धार्थी जिवन था, बहुत उमंग था, कुछ नया करने का मन था। बहुत ही साधारण परिवार से था। मेरा एक दोस्त आईएएस कमप्लिट किया। मेरे भी मन में ललक थी, मैंने पहली बार कोशिश की मेरा पहली बार इंढियन रेवेन्यू सर्विस में हुआ बाद में मैंने कोशिश की तो इंडियन पुलिस सर्विस में हुआ।

सवाल- आपकी प्रथम पोस्टींग चतरा में हुई, चतरा एक अति नक्सल प्रभावित जिला रहा है। क्या कहेंगे इस संदर्भ में?

जवाब- बहुत अच्छा मेरा अनुभव रहा, पहली बार मैंने गरीबी देखी, गरीबी को मैंने काफी करीब से देखा। पहली बार मैंने देखा कि लोग के पास दो वक्त के लिए भर पेट खाना भी नहीं होता है, मेरा व्यक्तिगत अनुभव हुआ। क्योंकि मैंने देखा जमुई में जो आदिवासी रहते हैं वो साल में बहुत महिनों तक महुआ खाकर अपना गुजारा करते है, चावल, दाल, रोटी कुछ नहीं मिलता है। 25 साल पहले यही स्थिति थी।अब क्या है, मैं नहीं बता सकता। गरीबों के प्रति मेरे हृदय में काफी संवेदना रहती है और उसके बाद मेरे पुलिसिंग पर साकारात्मक प्रभाव पड़ा।

सवाल- नक्सलवाद पर आपका क्या कहना है? इसलिए कि चतरा एक अति नक्सल प्रभावित जिला रहा है?

जवाब- नक्सलवाद तो एक विचारधारा है, साम्यवाद का स्थापना अंतिम उनका उद्देश्य है। समाजवाद एक सीढि है। जो इस व्यवस्था को नष्ट करना चाहते हैं। शस्त्र क्रांति के द्वारा इस व्यवस्था को उखाड़ फेंक कर के समाजवाद की स्थापना करना चाहते हैं।उनका मानना है कि व्यवस्था न्याय प्रशोसन पर टिकी हुई है और इसको शस्त्र कांन्ति से उखाड़ कर फेंक देना चाहिए।अब हम व्यवस्था के प्रतीक है, व्यवस्था के अंग हैं और पुलिस इस व्यवस्था का मजबुत अंग हैं और पुलिस से उनकी स्वभाविक दुश्मनी है, लड़ाई है। मैं ये मानता हूं कि पुलिस को नक्सलियों को सिधा दुश्मन नहीं मानना चाहिए। क्योंकि वो बाहर के कोई लोग नहीं हैं वो भटके हुए लोग हैं तो उनसे हमारा सैधांतिक मतभेद है। नक्सलवाद एक विचार धारा है। हम मानते है कि विचार को आप बंदूक से नहीं काट सकते।अगर विचार जिंदा रहेगा तो उसको ढ़ोने वाले कंधे भी मिल जायेंगे। विचार को विचार से काटना है तो हमको अपनी व्यवस्था को सुधार करना है और शोषण को,अन्याय को खत्म करना है। व्यवस्था को पारदर्शी करना है ताकि जो शोषित हैं,दलित हैं,पिड़ित हैं,गरीब हैं।उनकी आस्था इस व्यवस्था में फिर से स्थापित हो जाए और इसी तरह हृदय परीवर्तन करके हम उनपे काबू पा सकते हैं।हांलाकि शस्त्र सेना जो उनकी है जो पुलिस पर हमला करती है एवं नरसंहार करती है उनको तो पूरी तरह से रोकना पड़ेगा।

 

बच्चों के बिच डीजी गुप्तेश्वर पांडेय

सवाल- आप हमेशा सुर्खियों में बने रहते हैं।क्या वजह है?

जवाब- कोई वजह नहीं है।सरकार जो जिम्मेदारी देती है,उसको हम निष्ठा के साथ करते हैं। जनता के लिए पुलिसिंग का काम करते हैं। मेरे यहां मिलने का समय नहीं है।सुबह हो या शाम हो,घर हो,दफ्तर हो 24 घंटे हमारे यहां दरवाजा खुला रहता है। विशेष कर उनके लिए जो समाज के सबसे निचले पायदान पर हैं।जिनका कोई पहुंच नहीं है लोग आराम से आते है।मिलते और आराम से जाते है।

सवाल- अभी शराबबंदी को लेकर आप काफी कार्यक्रम चला रहे हैं। इसके बारे में आप क्या कहेंगे?

जवाब- मेरे लिए नशामुक्ति का कार्यक्रम या शराबबंदी कानुन के सफलता के लिए जन सभाएं मैं कर रहा हूं।ये कार्यक्रम मेरे लिए एक सामाजिक, अध्यात्मिक आंदोलन है। मैं ये मानता हूं कि नशा के सेवन से  मानव की चेतना गिर जाती है। मानव का नैतिक जिवन और उसकी नैतिकता समाप्त हो जाती है तथा उसका अध्यात्मिक क्षति हो जाता है।जिंदा भी है लेकिन उसका चेतना गिर जाता है तथा शराब पिने से उसका व्यवहार पशु की तरह हो जाता है। आप किसी धर्म के हो,किसी मजहब के हो,किसी दल के हो किसी को नशा का सेवन करना,शराब का सेवन करना अच्छी बात नहीं है।बिहार नशा मुक्त हो और मेरे हिसाब से सम्पूर्ण देश को भी नशामुक्त होना चाहिए। मैं इसे पवित्र अध्यात्मिक आंदोलन समझ करके इस मुहिम में लगा हुआ हूं।

सवाल- मुख्यमंत्री ने इस अभियान की जिम्मेदारी के तौर पर आपको सौंपा है? स्वयंसेवी संस्था ने आपको ब्रांड एंबेसेडर बनाने का ऐलान किया है।

जवाब- मुख्यमंत्री जी ने अलग से हमको कुछ सौंपा नहीं है, सारे पदाधिकारियों को आदेश दिया गया है। वहीं आदेश मेरे लिए भी है, कानून को लागू करने की जिम्मेदारी हम लागों कि है।पुलिस पदाधिकारियों को है।कानून के बारे में जानकारी देने का मेरी नैतिक जिम्मेदारी है कि लोगों को हम बतायें कि शराबबंदी कानुन उनके हित में है। बिहार में शराबबंदी और नशाबंदी को लेकर जो आदेश अन्य सरकारी कर्मियों के लिए है वही आदेश मेरे लिए है। हां, अपनी-अपनी रुचि की बात है। मुझे लगा कि मैं नशाबंदी और शराबबंदी अभियान में कुछ अलग कर सकता हूं। इसी उद्देश्य से कुछ विशेष करने का प्रयास कर रहा हूं।जहां तक स्वयंसेवी संस्था द्वारा ब्रांड एंबेसेडर बनाने की बात है तो गुजरात के स्वयंसेवी संस्था यूथ नेशन ने हमे इस लायक समझा। यह हमारा सौभाग्य है। सीएम से अभी तक शराबबंदी या नशाबंदी अभियान को लेकर हमारी कोई बातचीत नहीं हुई है। हमारे लिए यह गर्व की बात है कि बिहार सैन्य पुलिस के अभियान को गुजरात में नशा विरोधी मुहिम चला रही एक संस्था का भी साथ मिल गया है। हमारी कोशिश है कि अभियान को बिहार से बाहर पहुंचाया जाए। अभी तक मैंने 50 सभाएं की हैं। 500 करने का लक्ष्य है। मुहिम में जनता का स्नेह, आशीर्वाद, प्यार और सहयोग मिल रहा है।

इन्हें कम्युनिटी पुलिसिंग के पुरोधा के रूप जाना जाता है। कम्युनिटी पुलिसिंग के जरिए ही 1993-94 में बेगूसराय, 1995-96 में जहानाबाद जिले को अपराध मुक्त किया था।

सवाल- बिहार के संकटमोचक पदाधिकारी के रूप में आप जाने जाते है।ये सुन कर कैसा लगाता है?

जवाब- देखिए मुझे इसके बारे में पता नहीं।ये मीडिया के लोग और यहां के लोगों ने संकट मोचक कि उपाधी दे दी है। अपने को कभी संकट मोचक नहीं मानता। मै सिर्फ इतना ही मानता हूं की जहां भी कोई आपातकालीन कि स्थिति होती है,गंभीर समस्या कि स्थिति होती है।संप्रदायिक माहौल बिगड़ता है जब भी मुझे जाने का आदेश होता है तो मैं जाता हूं। और अपनी गुड वील का इस्तेमाल करके लोगों से मिलकर बातचीत करके उनको समझा-बुझा करके उनको शांत करा देता हूं। 30 वर्षों की सेवा मे कभी भी मैंने किसी पर भी गोली नहीं चलावायी। कभी लाठी चार्ज नहीं करवाया, लोगों की समस्या को सुन लेते हैं। चाहे वो हिन्दु हो या मुस्लमान या कोई भी धर्म का हो उसके बाद स्थिति को काबू में करने की कोशिश करता हूं और कामयाब भी हो जाता हूं। मैं कोई संकट मोचक नहीं हूं।

सवाल- चर्चा है कि आप लोकसभा की तैयारी कर रहें हैं?कहाँ से चुनाव लड़ेंगे?

जवाब- मै जहां भी जाता हूं तो काई न कोई कहता है कि आप लोकसभा का चुनाव लड़े। ये सवाल इसलिए होता है कि मैं जहां भी जाता हूं। मेरा कोई बैनर नहीं होता है, माईक से कोई प्रचार नहीं होता है, कोई कार्यकर्ता नहीं है,घर-घर जाकर के प्रचार करें, सूचना दें लेकिन एक दिन पहले मेरी आने की सूचना अखबार के द्वारा मिलती है तो लोग हजारों की संख्या में इकट्ठा होते हैं। मैं कहां-कहां से चुनाव लडुंगा। जहां जाते है तो हजारों की संख्या में लोग आ जाते हैं। चाहे बेतिया हो, बगहा हो, भागलपुर हो बेगूसराय हो, सोनपुर हो, छपरा हो, गोपालगंज हो,सीतामढ़ी हो। इन जिलों का नाम मैं इसलिए ले रहा हूं कि इन जिलों में मैं सभाएं कर चुका हूं।मैं कहां-कहां से चुनाव लडूंगा। मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मुझे राजनीति नहीं करनी, चुनाव नहीं लड़ना,बिल्कुल अफवाह है।इसमें कोई दम नहीं है। मैं शुद्ध सामाजिक काम कर रहा हूं। ये मेरा प्रोफेशनल काम भी है।